नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने दतिया उपचुनाव में टिकट न मिलने पर उग्र विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें NH-44 को जाम करना और पुलिस पर पथराव शामिल है। बवाल के बीच, मिश्रा ने चुप्पी तोड़ते हुए कार्यकर्ताओं से शांति की अपील की, इसे पार्टी का फ़ैसला बताया, जबकि सूत्रों के अनुसार वे स्वयं निराश थे। यह घटना मध्य प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के भीतर बढ़ते असंतोष को दर्शाती है।
मध्य प्रदेश के दतिया में बीजेपी कार्यालय के बाहर शुक्रवार शाम पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को बीजेपी उम्मीदवार बनाए जाने के बाद विरोध शुरू हुआ. यह विवाद शनिवार सुबह तक हिंसात्मक हो गया.
नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने सड़क जाम की और शनिवार सुबह पथराव की घटनाएं सामने आईं. प्रशासन के मुताबिक़, कई उच्च अधिकारियों समेत आठ पुलिसकर्मी घायल हुए.
कुछ प्रदर्शनकारियों के भी घायल होने की सूचना मिली. हालात बिगड़ते देख अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया. पूरे ज़िले में बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी गई.
बीजेपी ने शुक्रवार की शाम दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था. नरोत्तम मिश्रा दतिया से तीन बार विधायक रह चुके हैं लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में वो हार गए थे.
वहीं टिकट न मिलने के बाद पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “मुझे सोशल मीडिया पर पेट्रोल और मिट्टी का तेल डालते हुए वीडियो दिखाए गए. ऐसा कोई काम नहीं करना है. कल भी मैंने कहा था रोड बाधित नहीं करना है. पार्टी फोरम में अपनी बात कहें.”
लेकिन सवाल दतिया में हो रहे विरोध प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है.
सवाल यह भी है कि जिस नेता को कभी मध्य प्रदेश बीजेपी का सबसे प्रभावशाली चेहरा माना जाता था, जिनकी पहचान केवल दतिया तक सीमित नहीं थी, उनकी राजनीतिक वापसी को पार्टी ने आख़िर क्यों रोक दिया?
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों से बातचीत में इसके पीछे संगठन, सत्ता और चुनावी रणनीति की कई परतें सामने आती हैं.

