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क्या भारत में अब ‘तारीख’ नहीं ‘न्याय’ मिलेगा?  5.5 करोड़ मुकदमों के बोझ से मुक्ति के लिए देशव्यापी ‘जन सहयोग आंदोलन’ का शंखनाद

क्या भारत में अब ‘तारीख’ नहीं ‘न्याय’ मिलेगा?

5.5 करोड़ मुकदमों के बोझ से मुक्ति के लिए देशव्यापी ‘जन सहयोग आंदोलन’ का शंखनाद

नई दिल्ली: “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है।” यह कहावत भारत की अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े 5.5 करोड़ मुकदमों के बोझ तले दबकर केवल एक मुहावरा बनकर रह गई थी। लेकिन अब, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका (डायरी संख्या 26794/2025) पर दिए गए 19 जनवरी 2026 के ऐतिहासिक आदेश ने देश की न्याय व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस आदेश के अनुपालन और भारतीय संविधान की मूल आत्मा को जीवित करने के लिए ‘रूल ऑफ लॉ एंड जस्टिस सोसाइटी’ और ‘अखिल भारतीय हिंद क्रांति पार्टी’ ने हाथ मिलाकर एक अभूतपूर्व ‘जन सहयोग आंदोलन’ का आह्वान किया है।

संविधान की शक्ति से ‘निर्णय’ नहीं, अब ‘न्याय’ की बारी

आंदोलन का मुख्य जोर इस बात पर है कि अदालतें केवल कानूनी ‘निर्णय’ न सुनाएं, बल्कि ‘न्याय’ सुनिश्चित करें। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 50, 141, 142, 144 और 145 में निहित सर्वोच्च न्यायालय की असीमित शक्तियों का कड़ाई से पालन कराने की मांग की जा रही है।

“हमारा लक्ष्य केवल कानून की व्याख्या करना नहीं, बल्कि आम आदमी के विश्वास को बहाल करना है। जब संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय करने का अधिकार है, तो जनता को दशकों तक इंतजार क्यों करना पड़े?” – प्रवक्ता, आंदोलन समिति

मिशन ‘एक वर्ष’, न्याय प्रणाली का कायाकल्प

आंदोलनकारियों ने राष्ट्र के समक्ष दो बड़े लक्ष्य रखे हैं, जो देश की तस्वीर बदल सकते हैं।

शून्य लंबित कार्य~

देश की विभिन्न अदालतों में वर्षों से धूल फांक रहे 5.5 करोड़ मुकदमों का अगले 1 वर्ष के भीतर निस्तारण सुनिश्चित करना।

भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो 

सर्वोच्च न्यायालय को इतना सशक्त और संसाधन-युक्त बनाना कि भविष्य में किसी भी नए विवाद का समाधान अधिकतम 1 वर्ष की समय सीमा में अनिवार्य रूप से हो सके।

जवाबदेही और सुरक्षा दोतरफा सुधार

इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू न्याय व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। आंदोलन की प्रमुख मांगें हैं

पर्याप्त संसाधन सुविधा हो

न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और जांच एजेंसियों को आधुनिक साधन, बेहतर सुविधाएं और पुख्ता सुरक्षा प्रदान करना।

कठोर जवाबदेही तय हो 

केवल सुविधाएं ही नहीं, बल्कि पदीय दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतने पर न्यायाधीशों से लेकर जांच अधिकारियों तक के लिए दंड तय करने की व्यवस्था करना।

देश के नाम संबोधन और अपील

अखिल भारतीय हिंद क्रांति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश त्रिपाठी, एडवोकेट मुकेश सैनी (अध्यक्ष, रूल ऑफ लॉ एंड जस्टिस सोसाइटी), जितेंद्र सिंह और गौरव सिंघल ने संयुक्त रूप से देश के प्रबुद्ध नागरिकों, युवाओं और कानूनविदों से इस मुहिम में जुड़ने की अपील की है।

उनका मानना है कि जब तक जांच एजेंसियां स्वतंत्र नहीं होंगी और न्यायपालिका जवाबदेह नहीं होगी, तब तक ‘रामराज्य’ और ‘सुशासन’ की कल्पना अधूरी है।

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