‘खाली सिलेंडर’ के बाद अब ‘खाली मटका’ योजना का आगाज़!
मामला सोहावल जनपद के सोहौला, सोहावल, बाबूपुर ग्राम पंचायत का
सतना (सोहावल) — सोहावल के ग्रामीणों के लिए विकास की परिभाषा बदल गई है। यहाँ विकास का मतलब है—एक संकट खत्म न हो कि दूसरे का फीता कट जाए! पहले गैस संकट ने रसोई का धुंआ बंद किया, और अब मुख्यमंत्री नल-जल योजना ने प्यास पर ‘बिजली का करंट’ लगा दिया है।
सिलेंडर हुआ ‘शो-पीस’, अब टोंटी बनी ‘एंटीक’! अभी जनता चूल्हे के आगे बैठकर फूंक मारना सीख ही रही थी कि अब उसे बाल्टी लेकर ‘जल-सत्याग्रह’ की ट्रेनिंग दी जा रही है। सोहावल, सोहौला और बाबूपुर के सरपंचों ने तो साफ कह दिया है—”साहब, 80 रुपए की वसूली में 60 हजार का बिल नहीं भर सकते, हम कोई कुबेर के खजांची नहीं हैं!”गणित बड़ा सीधा है,गैस गायब-चूल्हा ठंडा,बिजली कटी- पानी बंद। परिणाम- जनता न घर की रही, न घाट की… क्योंकि घाट पर भी अब पानी नहीं बचा!
सबने झाड़ा पल्ला, जनता का हल्ला! विद्युत विभाग ने कैंची चला दी, सरपंचों ने हाथ खड़े कर दिए और मंत्री जी के विज्ञापनों में अभी भी ‘खुशहाली की गंगा’ बह रही है। सोहावल का 7 लाख बाबूपुर का ₹16 लाख और सोहौला का ₹8.45 लाख का बकाया अब ग्रामीणों के लिए ‘सूखा अकाल’ लेकर आया है।
आम जनता का आक्रोश “सरकार चाहती है कि जनता न खाए, न पिए… बस डिजिटल इंडिया के सपने देखे और विज्ञापनों से अपना पेट भरे!”