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सतना नगर निगम: जब ‘शुद्ध’ तांबे से छलका ‘गंदा’ सच!

सतना नगर निगम: जब ‘शुद्ध’ तांबे से छलका ‘गंदा’ सच!

भाजपा पार्षद ने खोली निगम की पोल

सतना नगर निगम की MIC बैठक में कल एक ऐसा ‘जल अभिषेक’ हुआ, जिसने निगम के दावों की प्यास बुझा दी। पार्षद अभिषेक तिवारी ‘अंशू’ ने तांबे की बोतल का साफ़ पानी जमीन पर क्या उड़ेला, मानों निगम के कागजी विकास का सारा कचरा सतह पर तैरने लगा।

बैठक का “फ्लोर टेस्ट”-
पार्षद जी का तर्क भी बड़ा ‘पारदर्शी’ था— “जब आधा शहर गंदा पानी पी रहा है, तो साहबों के गले साफ़ पानी से तर क्यों हों?” आमतौर पर निगम की बैठकों में विकास की गंगा बहाने की बातें होती हैं, लेकिन यहाँ तो सीधे फर्श पर ही गंगा (नल वाली, कीचड़ युक्त) की याद दिला दी गई। पिछले 20 दिनों से शहर की नलों से जो ‘स्पेशल सूप’ सप्लाई हो रहा है, उसे बोतल बंद मिनरल वाटर पीने वाले साहबों तक पहुँचाने का यह तरीका वाकई में काबिले-तारीफ था।

नगर निगम की खुली ‘पोल’-
नगर निगम सतना के लिए यह घटना किसी ‘आईना दिखाने’ से कम नहीं है।

तैयारी चकाचक, नीयत गायब – दीवारों पर चमकता हुआ बोर्ड “नगर पालिक निगम सतना” और मेज पर सजी चमचमाती तांबे की बोतलें ये बताने के लिए काफी थीं कि अंदर सब कुछ ‘वेल-सेटल्ड’ है। पर जमीन पर गिरा पानी चीख-चीख कर बता गया कि बाहर की जनता गंदे पानी से ‘अपसेट’ है।

20 दिन और ‘खामोश’ प्रशासन- आधे शहर में गंदे पानी की सप्लाई होना शायद प्रशासन की नजर में कोई ‘तकनीकी खराबी’ होगी, लेकिन जनता के लिए यह हर सुबह की जद्दोजहद है।

एक्शन या सिर्फ रिएक्शन?- पार्षद के इस प्रदर्शन के बाद अधिकारियों के चेहरों पर जो शिकन दिखी, काश वैसी ही चिंता पिछले 20 दिनों में पाइपलाइनों को सुधारने में दिखाई गई होती।

निर्णय का ‘कीचड़’
तांबे के बर्तन में पानी रखना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन सतना निगम ने साबित कर दिया कि सिस्टम में इतना ‘जंग’ लगा है कि तांबा भी उसे शुद्ध नहीं कर सकता। पार्षद ने तो पानी गिराकर अपना विरोध दर्ज करा दिया, अब देखना यह है कि निगम के साहबान इस ‘गंदे सच’ को धो पाते हैं या अगली बैठक में भी सिर्फ बोतलों की चमक ही बदलेंगे।

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