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“सोहावल में लोकतंत्र” शर्मसार पत्थर पर चमक रहे वीआईपी नाम, लेकिन ‘जनता के प्रतिनिधि’ का वजूद मिटाया! मामला सोहावल में नवीन जनपद कार्यालय निर्माण के भूमि पूजन का

“सोहावल में लोकतंत्र” शर्मसार पत्थर पर चमक रहे वीआईपी नाम, लेकिन ‘जनता के प्रतिनिधि’ का वजूद मिटाया!

मामला सोहावल में नवीन जनपद कार्यालय निर्माण के भूमि पूजन का

 

सतना (मध्यप्रदेश): जिले के सोहावल जनपद में पंचायती राज व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। नवीन जनपद पंचायत भवन के शिलान्यास की शिलापट्टिका (पत्थर) से जनपद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का नाम ही गायब कर दिया गया। जिस भवन में बैठकर जनता की समस्याओं का समाधान होना है, उसी की नींव में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के सम्मान की बलि चढ़ा दी गई।

क्या आदिवासी पहचान बनी अपमान की वजह?

सवाल खड़ा होता है कि क्या सोहावल के जनपद अध्यक्ष की आदिवासी पहचान की वजह से प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका नाम पत्थर पर लिखवाना उचित नहीं समझा? शिलापट्टिका में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और जिला पंचायत अध्यक्ष तक के नाम सुनहरे अक्षरों में चमक रहे हैं, लेकिन स्थानीय जनपद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का नाम न होना प्रशासन की नीयत पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

जनपद सदस्यों का फूटा गुस्सा “यह आखिरी चेतावनी है”

इस अपमान से आहत होकर समस्त जनपद सदस्यों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सदस्यों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब स्थानीय जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज किया गया हो। आक्रोशित सदस्यों ने सीधे तौर पर जनपद सीईओ की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा,”अगर प्रशासन का यही तानाशाही रवैया रहा, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। यह केवल हमारा नहीं, बल्कि उस जनता का अपमान है जिसने हमें चुनकर भेजा है। अब आर-पार की लड़ाई होगी।”

प्रशासनिक चूक या गहरी साजिश?

निर्माण एजेंसी ‘ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग सतना’ और जनपद कार्यालय के बीच तालमेल की यह कैसी कमी है कि स्थानीय मुखिया का नाम ही सूची से बाहर हो गया? क्या प्रशासनिक अधिकारी खुद को लोकतंत्र के चुने हुए प्रहरियों से ऊपर समझने लगे हैं?

इस घटना ने सोहावल में एक नई राजनीतिक जंग छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन इस ‘शिलापट्टिका विवाद’ पर अपनी गलती सुधारता है या जनप्रतिनिधियों का यह विरोध एक बड़े आंदोलन का रूप लेगा।

सोनू पाल की रिपोर्ट

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